बुद्ध को विश्व पद्मपीठ पर खड़े रूप में दर्शाया गया है, जो एक सीढ़ीनुमा चौकोर पीठ पर स्थित है, जिस पर पुष्प अलंकरण हैं। उनका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है, जबकि बायाँ हाथ संघाती वस्त्र (चिवर) के किनारे को कोमलता से पकड़े हुए है, जो दोनों कंधों पर सुंदरता से लिपटा है।
रजत जड़ित अधोमुखी नेत्र मन की एकाग्रता का प्रतीक हैं। प्रतिमा की सुन्दरता सरल किंतु उत्कृष्ट सौंदर्य रचना से पहचानी जाती है। छत्रस्तंभ तथा पंखयुक्त देवदूत है, जो इसकी दृश्य कथा को और समृद्ध करता है।
इस मूर्ति की अजंता शैली से प्रेरित कोमल मूर्तिकला और संतुलित विन्यास इसे लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध का माना जाता है। यह वाकाटक साम्राज्य की एक कांस्य प्रतिमा है, जो 1964 में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के निकट फोफनार ग्राम से प्राप्त मूर्तिभंडार (hoard) का हिस्सा है। पद्मपीठ पर अंकित शिलालेख में लिखा है ,“देयधर्मोऽयं नागाचारि वीरा / नागाचारि वीरा का दान।”