इस उत्कीर्ण सिलखड़ी मंजूषा में कभी भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष रखे गए थे। इसकी सतह पर प्रारंभिक ब्राह्मी लिपि में लिखा है: ”सुकिति-भतिनं ”सभागिनिकनंस- पुटादलनंइयामसलिला-निधानेबुद्धसाभगवतेसाकियानं,” जिसका अर्थ है “यह महान बुद्ध के अवशेषों का भंडार है, जो बुद्ध के भाइयों, शाक्यों ने अपनी बहनों, संतानों और पत्नियों के साथ एकत्र किया।” यह शिलालेख इस अवशेष के स्वयं भगवान बुद्ध का होने की पुष्टि करता है।। मंजूषा का गोल, सुडौल आकार, इसकी हल्की संकरी होती गर्दन, और शीर्ष पर बना छोटा कलश, स्तूप की वास्तुकला का एक सूक्ष्म मॉडल है।