पाल काल के आठ महान चमत्कारों (अष्टमहाप्रतिहार्य) को दिखाने वाले इस छोटे से स्तंभ में बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे विश्वपद्म पर वज्रासन में दिखाया गया है, जो भूमिस्पर्श मुद्रा में हैं। इस आसन पर मारा की तीन बेटियाँ उन्हें ज्ञान पाने से रोकने की कोशिश करती हुई दिखाई गई हैं, जबकि भूदेवी इस महत्वपूर्ण घटना की साक्षी हैं। दृश्य घड़ी की सूई दिशा में कहानी के क्रम में लगाए गए हैं, जिनमें शामिल हैं: लुम्बिनी में गौतम का जन्म, संकिसा में तुषित स्वर्ग से उनका अवतरण, सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश, और सबसे ऊपर, कुशीनगर में महापरिनिर्वाण। दूसरे दृश्य में श्रावस्ती में चमत्कार, राजगीर में नालागिरी को वश में करना, और वैशाली में एक वानर द्वारा मधु चषक अर्पण करना शामिल है।
प्रस्तर-पट्टिका का पृष्ठ भाग पर बौद्ध मत उत्कीर्ण है, जो अक्सर पाल-काल के शिलालेखों और कलाकृतियों पर सिद्धमातृका लिपि में लिखा हुआ दिखाई देता है, और इसे ‘ये धर्म हेतु‘ श्लोक के नाम से जाना जाता है। यह प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित उत्पत्ति) पर बुद्ध की शिक्षा का एक मुख्य सारांश है।
संस्कृत श्लोक (देवनागरी लिपि में):
ये धर्मा हेतु–प्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्य्–अवदत्। तेषां च यो निरोधो एवं वादी महा–श्रमणः॥
हिंदी अनुवाद:
“उन धर्मों (घटनाओं/वस्तुओं) में से जो कारणों से उत्पन्न होते हैं, उन कारणों को तथागत (बुद्ध) ने सिखाया है, और उनकी समाप्ति (निरोध) को भी। इस प्रकार महान श्रमण (महान संन्यासी) ने सिखाया।”