स्तूप की आराधना

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काल
लगभग 12वीं शताब्दी ई.

प्राप्ति स्थान
पाला, पूर्वी भारत

भाषा
संस्कृत

सामग्री
ताड़पत्र, प्राकृतिक रंग

आयाम
लंबाई – 53.6 सेमी, चौड़ाई – 5 सेमी

अवाप्ति संख्या
62.115
राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली

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पूर्वी भारत के पाल काल के दौरान बनाया गया यह 12वीं सदी का ताड़ के पत्तों का पाण्‍डुलिपि (अवाप्ति सं. 62.115) एक खास स्तूप की पूजा करते हुए आसमानी बौद्ध देवताओं को दिखाता है। इसका आकार 5 x 53.6 सेमी  है ​​और इसे प्रकृतिक रंगों से रंगा गया है, यह भक्ति कला और पवित्र ग्रंथ का मेल दिखाता है। कलाकृति के बीच में स्तूप है, जो ज्ञान की सच्चाई का प्रतीक है, जिसके दोनों ओर अंजलि मुद्रा में दो लंबे बोधिसत्व हैं, जो बाद की पाल कला शैली को दिखाते हैं। यह पाण्‍डुलिपि अष्टसहस्रिका प्रज्ञापारमिता (“8,000 पंक्यिों में ज्ञान की पूर्णता”) से है, जो खालीपन (शून्यता) और वैराग्य का दर्शन सिखाता है। बुद्ध का कोई निजी चित्र दिखाने के बजाय, यह स्तूप को पूजा की वस्‍तु के तौर पर दिखाता है। यह लेख प्रज्ञा (ज्ञान) के स्वभाव के बारे में बताता है और रूढ़ विचारों से जकड़े बिना छह पारमिता (पूर्णता) का पालन करने की सलाह देता है। यह पारंपरिक कार्यों को सर्वोच्‍च ज्ञान के साथ संतुलित करता है, और सभी जीवों के जागरण के लिए पुण्‍य और प्रज्ञा के मेल पर ध्‍यान केंद्रित करता है।

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