इस ताम्रपत्र को वर्ष 1921 में नालंदा में खोजा गया था। इसके अग्रभाग पर बयालीस पंक्तियाँ और पीछे की ओर चौबीस पंक्तियाँ हैं। प्राप्त शिलालेख संस्कृत भाषा में प्रारंभिक देवनागरी लिपि में लिखा गया है। शिलालेख गद्य और पद्य में है। मुहर पर शासन करने वाले पाल राजा, ‘श्री देवपालदेवस्य’ या ‘प्रसिद्ध देवपाल’ का नाम धर्मचक्र के नीचे अंकित है। यह बुद्ध धर्म को स्थापित करने और लोगों के बीच ज्ञान प्रसारित करने का प्रतीक है। एक के पीछे एक हिरण सारनाथ में प्रथम उपदेश की याद दिलाता है, जहाँ बुद्ध ने धर्मचक्र स्थापित किया था। यह शिलालेख सुवर्णद्वीप के शासक राजा बालपुत्रदेव के अनुरोध का उत्सव मनाता है, जिन्होंने उदारतापूर्वक अपने राजदूत के माध्यम से पाँच गाँवों का दान दिया था, जिनमें से चार राजगृह में स्थित थे। शिलालेख में राजा के माता-पिता के लिए पुण्य और सौभाग्यकारक, बुद्ध की पूजा करने, भिक्षुओं का सम्मान करने और नालंदा में मठ के रख-रखाव की प्रशंसा की गई है। दस्तावेज़ बंदोबस्ती की तारीख, (शासनकाल) वर्ष 29 के कार्तिक के 21वें दिन के साथ समाप्त होता है।
ऑब्वर्स : पंक्तिवार हिंदी अनुवाद (1–42)
1. ॐ स्वस्ति। सिद्धार्थ (भगवान बुद्ध) का वह चित्त, जो परोपकार में दृढ़था और जिसने उत्तम मार्ग का अभ्यास किया,
2. जिसकी सिद्धि सर्वोत्तम है, जिन भगवान की प्रजा में की गई क्रियाएँ,
3. त्रिधातु (तीनों लोकों) के प्राणियों को सिद्धि-पद प्रदान करने वाली हैं; जिनकी अत्यन्त उग्र वीर्य-शक्ति से विजय प्राप्त कर,
4. निर्वाण को प्राप्त किया—वे सुगत, समस्त अर्थों की भूमि के स्वामी हैं।
5. जिन्होंने अतुल सौभाग्य धारण किया और जो लक्ष्मी सहित पृथ्वी केस्वामी गोपाल के समान हुए।
6. जिनके दृष्टान्त के रहते पुण्यात्मा श्रेष्ठ बनते हैं; जिन पर श्रद्धा कीजाती है, और जिनसे पृथु, सागर आदि भी प्रसिद्ध हुए।
7. जिन्होंने निष्फल संग्रह को त्यागकर पृथ्वी को मुक्त किया; अश्रुपूर्णनेत्रों से उन्होंने पुनः अपने बंधुओं को देखा।
8. जिनकी अनन्त सेनाओं की चंचलता से समस्त विश्व को धारण करनेवाली पृथ्वी भी राजाओं द्वारा विचलित हो उठी।
9. जिनके चरण-संचार से आकाश भी मानो पक्षियों के विचरण योग्य होगया।
10. जिन्होंने शास्त्रार्थ को समझते हुए चलायमान समाज में वर्णों कोअपने-अपने धर्म में प्रतिष्ठित किया।
11. ऐसे धर्मपाल के पुत्र—जिन्होंने शत्रुओं का विनाश कर अपने पितरोंको स्वर्ग में प्रतिष्ठित किया।
12. जिनकी स्थिर और गतिशील सेनाओं, विशेषतः हाथियों की चंचलगति से पृथ्वी व्याकुल हुई,
13. फिर भी धूलकण के समान पृथ्वी ने बिना किसी उपद्रव के उनकीशरण ली।
14. जिन्होंने केदार, गंगा सहित बुद्ध (बौद्ध) क्षेत्र तथा गोकरण आदि तीर्थोंमें,
15. विधिपूर्वक धार्मिक क्रियाओं का अनुष्ठान किया।
16. जिनके शासन में सेवकों को सुख प्राप्त हुआ; जिन्होंने दुष्टों काउन्मूलन कर लोकों का कल्याण किया,
17. और जिनकी कीर्ति श्वेत तथा निष्कलंक बनी रही।
18. जिनके दिग्विजय के पश्चात् अन्य राजाओं द्वारा भेजे गए दूतों ने पुनःअपने स्वामी की भूमि में लौटकर सम्मान पाया।
19. जिनके उचित और प्रेमपूर्ण आचरण से राजाओं के हृदय उत्कंठा से भरउठे, मानो उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति हो आई हो।
20. श्री परबल की पुत्री, राष्ट्रकूट कुल के तिलक समान उस क्षितिपति कीकन्या—
21. राण्णादेवी—का पाणिग्रहण उस राजा ने गृहस्थ धर्म में किया।
22. मानो लक्ष्मी ने स्वयं शरीर धारण कर लिया हो,
23. या पृथ्वी ही देहवती बन गई हो, अथवा वह राजा की कीर्ति की मूर्तिहो,
24. अथवा गृहदेवी हो—ऐसा विचार करते हुए,
25. शुद्ध आचरण और विवेक से युक्त उस रानी ने,
26. स्वभावगत दोषों से ग्रस्त प्रजा को उत्तम गुणों द्वारा ऊपर उठाया।
27. वह प्रशंसनीय पतिव्रता थी, मानो समुद्र-शुक्ति से उत्पन्न मुक्तारत्न केसमान।
28. प्रसन्न मुख वाले उस पुत्र—श्री देवपालदेव—ने जन्म लिया।
29. जिनका मन, वाणी और कर्म शुद्ध और संयमित था,
30. और जिन्होंने पिता से राज्य प्राप्त कर बोधिसत्त्व की भाँति बौद्ध पदको प्राप्त किया।
31. जिनकी विजय-यात्रा में हाथियों द्वारा उछाले गए जल से विन्ध्य वनप्लावित हो गया और बंधु पुनः दृष्टिगोचर हुए।
32. जिनके युद्धों में अश्वारोही युवाओं ने अन्य राजाओं की शक्ति को नष्टकर दिया।
33. वही राजा, जिसने कृतयुग में बलि को, त्रेता में परशुराम द्वारा, द्वापर मेंकर्ण द्वारा और कलियुग में शकों के शत्रु द्वारा नष्ट किए गए त्याग-पथको,
34. पुनः स्पष्ट रूप से उद्घाटित किया।
35. जिन्होंने गंगा के आगमन से लेकर समुद्र-सेतु तक, दशानन की कीर्तिसे प्रसिद्ध पृथ्वी को,
36. वरुण के निकेतन समुद्र से लेकर सिंधु और लक्ष्मी के कुल-भवन तकभोगा।
37. जिनके शासन में भागीरथी के मार्ग पर विविध नौकाओं, सेतुओं औरखनिजों से युक्त समृद्धि फैली,
38. और जिनकी सेना के अश्वों के खुरों से उड़ी धूल से दिशाएँ धूसर होगईं, तथा समस्त जम्बूद्वीप के राजाओं ने परमेश्वर की सेवा की।
39. ऐसे परम सौगत, परमेश्वर, परमभट्टारक, महाराजाधिराज श्रीधर्मपालदेव के चरणों का ध्यान करने वाले,
40. परम सौगत, परमेश्वर, परमभट्टारक महाराजाधिराज श्री देवपालदेवकुशलपूर्वक,
41. श्रीनगर-भुक्ति में, राजगृह विषय के अंतर्गत अजपुरा नय से संबद्ध—नन्दिवनक, मणिवाटक, नटिका, हस्तिग्राम तथा पालमाक ग्रामों के विषयमें,
42. यह आदेश देते हैं कि ये ग्राम अपनी समस्त सीमाओं, भूमि, जल, वृक्ष, कर-मुक्ति सहित—पूर्व दत्त देव एवं ब्राह्मण दानों को छोड़कर—माता-पिता और स्वयं के पुण्य एवं यश-वृद्धि हेतु दान किए गए हैं; अतःसब लोग इसे अनुमोदित करें, पालन करें और नियत समय पर भाग, भोग, कर, स्वर्ण आदि की आपूर्ति करें।
संवत् 39, कार्तिक, दिन 21।
रिवर्स: (43–66) : क्रम यथावत हिंदी अनुवाद
43. इसी प्रकार धर्मशास्त्रों में ये श्लोक कहे गए हैं, जिन्हें पूर्वकालीनराजाओं ने पृथ्वी-दान के विषय में कहा था—
44. सगर आदि राजाओं द्वारा दी गई भूमि—जिसकी जो भूमि है, उसी कोउसी का फल प्राप्त होता है।
45. जो व्यक्ति स्वयं द्वारा दान की गई अथवा किसी अन्य द्वारा दान कीगई भूमि का हरण करता है,
46. वह विष्ठा में कीड़ा बनकर अपने पितरों सहित नरक में पकाया जाताहै।
47. भूमि दाता स्वर्ग में साठ हजार वर्षों तक आनंद भोगता है; और जो उसेछीनता है अथवा उसका अनुमोदन करता है,
48. वे उतने ही समय तक नरक में निवास करते हैं।
49. हे युधिष्ठिर! अन्य द्वारा दान की गई भूमि को द्विजों (ब्राह्मणों) के लिएप्रयत्नपूर्वक सुरक्षित रखो;
50. क्योंकि पृथ्वी धारण करने वालों में भूमि-दान की रक्षा, दान से भीश्रेष्ठ मानी गई है।
51. जो लोग हमारे उदार कुल-क्रम को आगे बढ़ाते हैं, और अन्य लोग भी—वे इस दान का अनुमोदन करें;
52. क्योंकि लक्ष्मी बिजली और जल के समान चंचल है, और दान काफल परलोक में यश की रक्षा करता है।
53. कमल-पत्र पर स्थित जल-बिंदु के समान चंचल मानव-जीवन कोनश्वर समझकर,
54. इस सम्पूर्ण उपदेश को जानकर बुद्धिमान पुरुष पर-कीर्ति का नाशनहीं करते।
55. जैसे राजा की दाहिनी भुजा शत्रु-बल के विनाश में सहायक होती है,
56. वैसे ही इस धर्मकार्य में श्री बलवर्मा ने बिना किसी आश्रय की अपेक्षाकिए दूत का कार्य किया।
57. इस धर्म-आरम्भ में श्री देवपालदेव के दूत के रूप में,
58. व्याघ्रतटी-मण्डल के अधिपति श्री बलवर्मा ने यह दायित्व निभाया।
59. वह यवभूमि (जावा) का राजा था, जिसके चरणकमल समस्त राजाओंके मुकुटों की चमक से प्रकाशित थे,
60. जो शैलेन्द्र वंश का तिलक था और ‘वीर-वैरी-मथन’ नाम से प्रसिद्धथा।
61. जिसकी कीर्ति मानो साकार होकर प्रासादों, कुमुदों, कमलनालों,
62. शंख, चन्द्र, कुंद पुष्प और हिम पर चरण रखते हुए,
63. निरन्तर सभी दिशाओं में गाई जाकर सम्पूर्ण संसार में फैल गई।
64. जिसके क्रोध से भौंहें टेढ़ी होते ही शत्रुओं की लक्ष्मी उनके हृदय सहितनष्ट हो जाती थी;
65. सचमुच, परोपकार में कुशल किन्तु दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों की गतिसंसार में अत्यन्त विकृत होती है।
66. उसका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो नीति, पराक्रम और शील से सम्पन्नथा, और जिसके चरणयुगल सैकड़ों राजाओं के मुकुटों से प्रकाशित होतेथे।

