शहद के कटोरे के साथ बैठे बुद्ध की यह मूर्ति, बिहार की है और पाल कला शैली से जुड़ी है। यह काले बेसाल्ट में बेहतरीन कारीगरी का नमूना है। बुद्ध को ध्यान मुद्रा में दिखाया गया है, वे दो कमल के आसन पर शांत भाव से बैठे हैं, जो गहरे ध्यान का प्रतीक है। उनकी गोद में रखा शहद का कटोरा दया और ज्ञान की मिठास को दिखाता है, जो ध्यान करते हुए बुद्ध को मधुमक्खियों द्वारा शहद चढ़ाने की कहानी की याद दिलाता है। सुंदर सेवक, सजा हुआ प्रभामंडल और शेर की बनावट पाल काल की शान और भक्ति वाली कलाकारी को दिखाते हैं। अंडाकार प्रभामंडल पर बौद्ध धर्म का वह सिद्धांत अंकित है जो अक्सर पाला काल के सिद्धमातृका लिपि में लिखे शिलालेखों और कलाकृतियों में दिखाई देता है, और इसे ‘ये धर्म हेतु’ श्लोक के नाम से जाना जाता है। यह प्रतीत्यसमुत्पाद (प्रतीत्यसमुत्पाद) पर बुद्ध की शिक्षा का सार है।
संस्कृत श्लोक (देवनागरी लिपि में): ये धर्मा हेतु-प्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्य्-अवदत्। तेषां च यो निरोधो एवं वादी महा-श्रमणः॥अनुवाद: तथागत ने उन घटनाओं के कारणों का वर्णन किया है जो किसी कारण से उत्पन्न होती हैं, और उनके निवारण का भी। महाश्रमण ने ऐसा कहा है।