भाव-चक्र बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है जो आश्रित उत्पत्ति (प्रतीत्य-समुत्पाद) के नियम से संचालित पुनर्जन्म के निरंतर चक्र को दर्शाता है। इसे अक्सर एक भयानक प्राणी द्वारा पकड़े गए पहिये के रूप में चित्रित किया जाता है, जो जीवन की अस्थायी प्रकृति को याद दिलाता है। पहिये के केंद्र में तीन विष—राग (लाल कबूतर), क्रोध (हरा साँप), और अज्ञान (काला सुअर)— निहित हैं, जो इस चक्र को गति प्रदान करते हैं। केंद्र और परिधि के बीच के भाग को पाँच या छह लोकों (देव, असुर, मनुष्य, पशु, प्रेत, और नारकीय) में विभाजित किया गया है, जो पुनर्जन्म के विभिन्न रूपों को दर्शाते हैं। परिधि पर बारह निदान प्रतीकात्मक रूप से अंकित हैं, जो अस्तित्व के परस्पर जुड़े बारह चरणों (जैसे अज्ञान, संस्कार, चेतना, जन्म, और जरा-मरण) को दर्शाते हैं, जो इस पूरे चक्र को बनाए रखते हैं।