एक मुकुटधारी बुद्ध को विश्व पद्मपीठ पर पद्मासन में भूमिस्पर्श मुद्रा में विराजमान दिखाया गया है। — यह ज्ञान प्राप्ति के क्षण का प्रतीक है। यह प्रतिमा एक सुंदर त्रिलोबीय आर्च (त्रिलोकाकार तोरण) वाले मंदिराकार फ्रेम में स्थित है, जिसके चारों ओर बोधि वृक्ष के अलंकरण तथा पुष्प अर्पित करते देवताओं की सजावट है।
बुद्ध के बाईं ओर अवलोकितेश्वर और दाईं ओर मैत्रेय बोधिसत्त्व स्थित हैं, जिन्हें उनके विशिष्ट प्रतीकात्मक चिह्नों से पहचाना जा सकता है। पद्मपीठ पर पृथ्वी देवता भूदेवी सहित उभरी हुई नक्काशी दिखाई देती है, जो मारा के पराजय के क्षण की साक्षी हैं, साथ ही अन्य प्रतीकात्मक आकृतियाँ भी हैं जो बुद्ध के चक्रवर्ती अथवा विश्व सम्राट की भूमिका को दर्शाती हैं।
पद्मपीठ के निचले भाग में एक समर्पणात्मक शिलालेख है।
संस्कृत:
सिद्धं श्रीधम वादी भेत्व देवधर्मोयं दानपति वलाका-गणो(ण)-शास्य [॥]
हिंदी में अनुवाद:
‘सफलता! यह दानदाता श्रीदाम का धार्मिक कर्तव्य (या पुण्य कार्य) है, जिसने देवताओं के निवास (देवलोक) तक पहुँचकर (या मिलकर), भिक्षुओं/तपस्वियों के समूह (वलाका-गण) को शिक्षा देते हुए, दान का स्वामी बन जाता है।‘